मैं क्यों लिखता हूँ
लहलहाती फ़सलों के लिए,
मेहनतकश हाथों के लिए,
नौजवान नस्लों के लिए,
आज, कल और परसों के लिए।
बल्कि यूँ कहूँ…
आने वाले कई बरसों के लिए,
कुछ नया कर गुज़रने के लिए,
मैं क्यों लिखता हूँ
बुझती हुई उम्मीदों के लिए,
आँखों में पलते ख़्वाबों के लिए,
रास्ता खोजते क़दमों के लिए,
भटकते हुए जवाबों के लिए।
ख़ालीपन को भरने के लिए,
टूटकर फिर सँवरने के लिए,
हारकर भी निखरने के लिए,
मैं क्यों लिखता हूँ
उनके लिए जिनके पास आवाज़ नहीं,
जिनके हिस्से में कोई आग़ाज़ नहीं,
जिनके सपनों का कोई हमराज़ नहीं,
जिनके जीवन में ख़ुशियों का राज़ नहीं।
उनके होंठों पर मुस्कान धरने के लिए,
उनके ज़ख़्मों पर मरहम लगाने के लिए,
इंसानियत के लिए,
बहुत लोग लिखते हैं
धन के लिए,
अपने नाम और यश के लिए,
तालियों की गूँज और वाहवाही के लिए,
सत्ता की ऊँची परछाईं के लिए।
मैं क्यों लिखता हूँ
सोई चेतना जगाने के लिए,
अँधेरों को आईना दिखाने के लिए,
झूठ के तिलिस्म को मिटाने के लिए,
मैं क्यों लिखता हूँ
श्रम के सम्मान के लिए,
भूखे पेटों को अन्न के लिए,
हर बच्चे को शिक्षा के लिए,
हर जीवन को गरिमा के लिए।
नफ़रत की दीवारें गिराने के लिए,
दिलों में मोहब्बत उगाने के लिए,
भेदभाव की बेड़ियाँ मिटाने के लिए,
मैं क्यों लिखता हूँ
शांति के लिए,
मनुष्यता की क्रांति के लिए,
अन्याय के प्रतिकार के लिए,
नवयुग के निर्माण के लिए।
कलम को मशाल बनाने के लिए,
हर मौन को आवाज़ दिलाने के लिए,
सोई हुई व्यवस्था को जगाने के लिए,
मैं क्यों लिखता हूँ
जीने के लिए,
हर साँस का अर्थ सीने के लिए,
अपने समय का सच कहने के लिए,
आने वाले कल से कुछ कहने के लिए।
यह लेखन महज़ अल्फ़ाज़ नहीं,
मेरे होने का प्रमाण है,
मेरी कलम मेरी प्रतिबद्धता,
मेरा हर अक्षर एक अभियान है।
मैं क्यों लिखता हूँ
किसी पुरस्कार के लिए नहीं,
केवल अपने प्रचार के लिए नहीं,
बल्कि उस दुनिया के निर्माण के लिए,
जहाँ इंसान इंसान के काम आए,
जहाँ हर चेहरे पर विश्वास मुस्काए।
-रतन कुमार कैथवास
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