खोई हुई कश्ती के लिए, एक पैग़ाम लिख रहा हूँ,
लहरों के सीने पर ठहरा, अपना मुक़ाम लिख रहा हूँ।
सूरज के डूबने की प्रतीक्षा में सब रुके हुए हैं,
मैं डूबती हुई शाम में भी, सुबह के ख़्वाब लिख रहा हूँ।
जो लौटकर नहीं आए, उनके नाम सलाम लिख रहा हूँ।
साहिल पे खड़े लोग अभी, तूफ़ानों का हिसाब करते हैं,
लहरों से बचने की ख़ातिर, मौसम के सवाल करते हैं।
किसे ख़बर कि दरिया में कितने इम्तिहान पलते हैं,
जो बीच भँवर में होते हैं, वही रास्ते बदलते हैं।
मैं डूबने के डर से नहीं, लड़ने का अंजाम लिख रहा हूँ।
सूरज भी ढलता है आख़िर, रातों का पहरा आता है,
हर उजाले के पीछे भी, अँधियारा नज़र आता है।
लेकिन जो दीप जलाते हैं, वे कब हार मानते हैं,
जो वक़्त की आँखों में देखें, वे कब राह बदलते हैं।
मैं अँधेरे की पेशानी पर, रोशनी का नाम लिख रहा हूँ।
कश्ती अगर खो गई तो क्या, दरिया अभी भी बाक़ी है,
सीने में हौसला ज़िंदा है, मंज़िल की प्यास बाक़ी है।
टूटे हुए पतवारों से भी, कुछ रास्ते निकलेंगे,
जो आज किनारों पर ठहरे, कल लहरों से भिड़ेंगे।
मैं हार के मलबे से उठकर, जीत का इंतज़ाम लिख रहा हूँ।
तुम सूरज के डूबने तक, यूँ ही प्रतीक्षा करते रहना,
मैं लहरों के बीच खड़ा हूँ, तुम साहिल पर ठहरे रहना।
कल किसकी होगी जीत, इसका फ़ैसला वक़्त करेगा,
किसका हौसला तूफ़ानों में इतिहास नया लिखेगा।
मैं खोई हुई कश्ती के नाम, लौटने का पैग़ाम लिख रहा हूँ।
-रतन कुमार कैथवास
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