माथे पर चंदन का लेप लगा दो,
कुछ तो इस बेचैनी से राहत मिलेगी,
ऐसे कैसे चुपचाप चले जाओगे,
पहले मेरे सवाल का जवाब दो…
फिर देखना, ये पेशानी खुद-ब-खुद ठंडी हो जाएगी।
तुम कहते हो माथा गरम है मेरा,
चंदन लगा दूँ तो आराम मिलेगा,
अरे जनाब, बात माथे की कहाँ है,
तुमसे जो पूछा है उसका जवाब मिलेगा,
तभी ये माथा भी ठंडा मिलेगा।
मुझे दवा नहीं, तुम्हारी बात चाहिए,
इस उलझे मन को बस एक सौगात चाहिए,
तुम हँसकर कह दो… “हाँ, मैं हूँ,”
फिर किसे चंदन की जरूरत होगी,
इस दिल को तो बस तुम्हारा साथ चाहिए।
तुम हर दर्द का इलाज बताते हो,
हर बात पर समझाते हो,
मगर मेरी इस बेचैनी की वजह,
क्यों नहीं समझ पाते हो?
पहले मेरी बात का जवाब दे दो,
फिर चाहे चंदन लगाओ या रूठकर चले जाओ।
ये माथा भी अजीब है मेरा,
बिना वजह कहाँ तपता है,
तुम सामने आकर दो शब्द बोल दो,
देखना, सारा गुस्सा भी ढलता है।
चंदन रहने दो,
वो खुशबू तो दे सकता है, सुकून नहीं,
तुम सिर्फ एक जवाब दे दो,
फिर इस दिल को, इस माथे को, किसी मरहम की जरूरत नहीं।
और अगर फिर भी कहोगे…
“माथा ठंडा कर लो पहले,”
तो मैं भी हँसकर कह दूँगी…
“पहले सवाल का जवाब दे दो जनाब,
तुम्हें क्या पता,
तुम्हारी एक हाँ से,
मेरे माथे से पहले,
मेरा पूरा मन तृप्त होकर माथा ठंडा हो जाएगा।”
-रतन कुमार कैथवास
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