तेरी फ़ितरत और समंदर की फ़ितरत एक-सी निकली,
जीने भी नहीं दिया, मरने भी नहीं दिया।
हमने हर लहर से पूछा, किनारा कहाँ मिलेगा,
समंदर ने डुबोया भी नहीं, तैरने भी नहीं दिया।
तेरी याद भी समंदर की लहरों जैसी निकली,
सुकून लेने न दिया, बेचैनियों से निकलने भी न दिया।
बड़ी अजीब थी समंदर की हमसे दुश्मनी,
डूबने दिया नहीं, और साहिल तक पहुँचने भी नहीं दिया।
वो भी तेरी तरह मेरे हाल पर हँसता रहा,
न जीने की वजह दी, न मरने का हौसला दिया।
हम तो समझे थे समंदर में पनाह मिल जाएगी,
उसने भी तेरी तरह न जगह दी, न रास्ता दिया।
कितना बेरहम था ये समंदर भी मेरी क़िस्मत की तरह,
लहरों में उलझाए रखा, किनारे का पता भी न दिया।
-रतन कुमार कैथवास
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