जो ज़िंदगी को किताबों से नापता है, उसे ज़मीनी एहसास भी होना चाहिए,
ज़िंदा रहने के पीछे सही तर्क हो, तो सवालों का जवाब भी होना चाहिए।
हर साँस का हिसाब माँगने वालों, कभी धड़कनों की ज़ुबानी सुनो,
सिर्फ़ शब्दों में नहीं, इंसान को उसके संघर्ष की कहानी से चुनो।
हर सच को समझने के लिए, नज़र में थोड़ा विस्तार होना चाहिए।
कोई आदमी जूतों की नाप से बाहर नहीं, ये कैसा पैमाना है,
किसी की औक़ात को नापना, तुम्हारी सोच का अफ़साना है।
किसी के पाँव में छाले हैं, किसी के हिस्से में राह कठिन,
किसी के माथे पर धूप लिखी है, किसी के हिस्से में छाँव सघन।
क़द जूतों से नहीं बढ़ता, इंसान का किरदार जोरदार होना चाहिए।
किताबों में दर्ज़ उसूलों से, हर फ़ैसला नहीं होता,
हर आँसू का अर्थ शब्दों में, पूरा बयान नहीं होता।
कभी भूख से पूछो जीने का, कभी मज़दूर से श्रम का अर्थ,
कभी किसान से पूछो आख़िर, क्यों मिट्टी ही उसका स्वर्ग।
तर्क वही मुकम्मल है, जिसमें जीवन का सार होना चाहिए।
जो हर बात में प्रमाण माँगे, वो अनुभव को क्या जानेगा,
जो केवल पन्ने पढ़ता हो, वो दर्द कहाँ पहचानेगा?
किसी की चुप्पी में तूफ़ान, किसी की हँसी में पीर मिले,
किसी के छोटे-से जीवन में, सदियों का इतिहास मिले।
इल्म के साथ इंसानियत का भी व्यवहार होना चाहिए।
ज़िंदगी कोई गणित नहीं है, हर प्रश्न का हल मिल जाए,
कुछ रिश्ते तर्कों से ऊपर, कुछ दर्द न शब्दों में आएँ।
जीने का हक़ साबित करने को, कोई अदालत क्यों हो,
इंसान होने के लिए आख़िर, कोई निर्धारित शर्त क्यों हो?
जो जीवन को नापने निकले, पहले उसे स्वीकार होना चाहिए।
-रतन कुमार कैथवास
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