कछार के खेत में तरबूज़ फोड़कर कभी खाया है?
मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू को कभी दिल में बसाया है?
किनारे बैठकर दुनिया का नक़्शा खींचने वालो,
क्या तुमने धूप में जलकर ज़िंदगी को आज़माया है?
पहले ज़मीन पर उतरो, फिर हक़ीक़त को पहचानो,
खेतों की मेड़ पर चलकर पसीने का मोल जानो।
जो आँखों से देखा है, उसे ग़ौर से परखना,
फिर अपने तजुर्बों को काग़ज़ पर उतारना।
न सुनी-सुनाई बातों को सच का लिबास देना,
न अपनी कल्पनाओं को अनुभव का नाम देना।
जो ख़ुद नहीं गुज़रे, उस दर्द पर क्या लिखोगे,
बिना देखे हक़ीक़त को फ़ैसलों का अंजाम देना?
किताबों से निकलकर कभी खेतों में भी आना,
मज़दूर के पसीने और किसान का दर्द जानना।
ज़िंदगी सिर्फ़ आँकड़ों से समझ नहीं आती,
हर दावे से पहले सच की कसौटी पर आज़माना।
कलम की असली ताक़त, सच को सच बताने में है,
न कि हर बात में, मसालों का रंग चढ़ाने में है।
पहले देखो, समझो, परखो, फिर अपनी बात लिखो,
लेखन की साख, हक़ीक़त को, ईमानदारी से दिखाने में है।
-रतन कुमार कैथवास
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