कंकर-कंकर ढूँढ़ रहा है, पर्वत के उस पार,
किस चीज़ की खोज में निकले, लेकर मन में प्यार।
दिखीं पार्वती, पूछ ही बैठीं… कहाँ मगन हो भोले,
किस पत्थर में क्या खोज रहे हो, बोलो मेरे भोले।
भोले बोले… कंकर में भी तो शंकर का बसा है पूरा संसार,
जिसे समझ ले मन से कोई, वही पाए साक्षात्कार।
पार्वती हँसकर बोलीं… बात तुम्हारी बड़ी निराली,
पत्थर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते भूल गए क्या अपनी गौरी प्यारी।
भोले बोले… तुम साथ हो तो क्या चिंता, क्या विचार,
तुम्हें छोड़कर भला कहाँ जाऊँ, तुम ही मेरा संसार।
पार्वती मुस्काईं… अब समझी मैं सारा तुम्हारा खेल,
कंकर-कंकर में शंकर ढूँढ़ो, पर घर लौटो शाम ढले।
ये कैसा भौकाल तुम्हारा, मेरी प्यारी गौरी,
ज्यादा ढील मिली है भोले तुमको, मुझसे अब भी |
कुछ बातें हमसे भी करलो, प्यारे भोले मेरे,
हम तो घर छोड़ के बैठे हैं, कैलाश पे आपके संग |
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X