जिस दिन नफ़रत का सूरज हर बस्ती को जलाएगा,
हर बच्चा अपने ख़्वाबों से डरकर आँख चुराएगा,
उस दिन बाँट लेंगे मैं और तुम, थोड़ी-सी छाँव इंसानियत के लिए।
जिस दिन सरहद के दोनों ओर लहू का रंग एक होगा,
और हर माँ की आँखों में बिछड़ने का प्रसंग होगा,
उस दिन खोल देंगे मैं और तुम, दिल का हर दरवाज़ा मोहब्बत के लिए।
जिस दिन मंदिर की घंटी और अज़ान से डर होगा,
जिस दिन हर इंसान का इंसान होना बेअसर होगा,
उस दिन जलाएँगे मैं और तुम, एक दिया भाईचारे के लिए।
जिस दिन फूलों से ज़्यादा हथियारों की बात होगी,
हर सुबह मातम में डूबी, हर शाम लहूलुहान होगी,
उस दिन उगा देंगे मैं और तुम, एक बाग़ आने वाली नस्लों के लिए।
जिस दिन प्रेम की भाषा क़ानूनों में गुनाह होगी,
और सच्चाई भीड़ के आगे बेबस और तबाह होगी,
उस दिन लिखेंगे मैं और तुम, एक नई इबारत इंसानी पनाह के लिए।
जिस दिन ईश्वर हैरान हो जाएगा, हर रिश्ता बोझ कहलाएगा,
जब दुनिया का हर कोना नफ़रत से भर जाएगा,
तब भी बचा लेंगे मैं और तुम,
युद्ध से कराहती धरती में थोड़ी-सी ज़मीन मोहब्बत के लिए।
क्योंकि जब तक एक दिल में दूसरे दिल की जगह रहेगी,
उजड़ी हुई इस दुनिया में जीने की एक वजह रहेगी।
-रतन कुमार कैथवास
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