हम्बल होना भी रईसी का एक अंदाज़ है जनाब,
हर किसी के बस में कहाँ होता है इसे अफोर्ड करना।
कुछ लोग दौलत से अपनी पहचान बनाते हैं,
कुछ अपनी विनम्रता से दिलों में मक़ाम पाते हैं।
अकड़ दिखाना आसान है, अदब निभाना मुश्किल है,
ऊँचा उठकर भी झुके रहना हर किसी के बस में नहीं है।
दौलत तो बाज़ार से खरीदी जा सकती है,
मगर किरदार की रईसी किसी दुकान में नहीं बिकती है।
हम्बल होना भी एक महँगा हुनर है,
अपने अहंकार पर जीत ही असली ज़ेवर है।
झुकना जिसे आ जाए, वही दिलों का हुक्मरान हो सकता है।
रईसी सिर्फ़ नोटों से नहीं, नज़रिए से आती है,
असली शख़्सियत दूसरों को इज़्ज़त देने से बनती है।
जो ऊँचे मुक़ाम पर रहकर भी ज़मीन से जुड़ा रहे,
हर अमीर के पास विनम्रता हो, ये ज़रूरी नहीं,
हर ग़रीब के दिल में खुद्दारी हो, ये भी कम नहीं।
हम्बल होना दौलत का नहीं, दिल का कमाल है,
जो ख़ुद को बड़ा तो समझे, मगर दूसरे छोटों का ख़याल भी रखे… वही बेमिसाल है।
-रतन कुमार कैथवास
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