आँधी से जो आँख मिलाए,
उसका कैसा भय से नाता,
जिसके भीतर अग्नि जल रही,
कौन उसे बुझा है पाता।
पर्वत भी पथ रोकें तो क्या,
चलने का निषेध नहीं है,
हार मान लें हम मुश्किल से,
यह बिल्कुल आसान नहीं है।
मन के नभ में उड़ने वाले,
कब पिंजरों से घबराते हैं,
जिनके स्वप्न बड़े होते हैं,
वे कब चैन से सो पाते हैं।
पंख कतर देने से उड़ने,
का संकल्प समाप्त नहीं है,
हार मान लें हम मुश्किल से,
यह बिल्कुल आसान नहीं है।
दर्द अगर अभिव्यक्ति माँगे,
आँसू केवल जल कब होते,
कुछ पीड़ाएँ ऐसी भी हैं,
जो कविता में ढलकर रोते।
मौन हृदय की भाषा समझो,
हर पीड़ा का नाम नहीं है,
हार मान लें हम मुश्किल से,
यह बिल्कुल आसान नहीं है।
कितनी बार समय ने छीना,
कितनी बार नियति ने तोड़ा,
फिर भी हमने हिम्मत करके,
हर मुश्किल का रुख़ है मोड़ा।
टूट गए हों स्वप्न भले ही,
स्वप्नदृष्टा निष्प्राण नहीं है,
हार मान लें हम मुश्किल से,
यह बिल्कुल आसान नहीं है।
जो इतिहास बदलने निकले,
वे कब सुविधा के अभिलाषी,
जिनके मन में लक्ष्य बसा हो,
वे कब होते हैं हताश भी।
राह कठिन है, मान लिया पर,
चलने पर प्रतिबंध नहीं है,
हार मान लें हम मुश्किल से,
यह बिल्कुल आसान नहीं है।
हमको केवल देह समझना,
चेतनता का अपमान है,
मन की गहराई नाप सके,
कहाँ किसी का ऐसा ज्ञान है।
जब तक साँसों में जिजीविषा,
तब तक अंतिम विराम नहीं है,
हार मान लें हम मुश्किल से,
यह बिल्कुल आसान नहीं है।
-रतन कुमार कैथवास
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