गर मैं घुटनों के बल ना बैठूँ,
और ना दूँ, महकते गुलाब तुम्हारे हाथों में,
तो क्या मेरी मोहब्बत अधूरी रह जाएगी, तुम्हारी चाहतों की किताब में?
क्या प्रेम का, कोई और अंदाज़ नहीं,
क्या दिल की धड़कन का, कोई अल्फ़ाज़ नहीं?
गर मैं चाँद-तारे तोड़कर ना लाऊँ,
तुम्हारी हर ज़िद पर सर ना झुकाऊँ,
ना लिखूँ तुम्हारे नाम ग़ज़लें,
ना हर महफ़िल में तुम्हें सुनाऊँ,
तो क्या मेरे इश्क़ की, कोई पहचान नहीं,
क्या ख़ामोश चाहत का, कोई सम्मान नहीं?
गर मैं हर बार पहले ना बुलाऊँ,
अपनी बेचैनी का सबब ना बताऊँ,
तुम्हारी बेरुख़ी पर भी मुस्कुराकर,
हर बार तुम्हें ना मनाऊँ,
तो क्या रिश्ता निभाने का मुझे हुनर नहीं,
क्या मेरे सीने में तुम्हारा कोई असर नहीं?
मैं प्रेम करूँ तो अपना वजूद भी रखूँ,
तुम्हारी चाहत में अपना उसूल भी रखूँ,
तुम्हारे लिए दिल के दरवाज़े खुले हों,
मगर अपनी ख़ुद्दारी महफ़ूज़ भी रखूँ,
मोहब्बत है, कोई इम्तिहान नहीं,
जहाँ ख़ुद को मिटाना ही सम्मान हो।
गुलाबों से बढ़कर मेरी बात देखो,
मेरी आँखों में छिपे जज़्बात देखो,
जो बिन कहे तुम्हारा दर्द पढ़ ले,
उस दिल की सच्ची सौग़ात देखो,
हर प्यार का इज़हार ज़ुबानी नहीं होता,
हर चाहने वाला घुटनों पर नहीं होता।
तुम्हें चाहना मेरी अपनी ख़ुशी है,
तुम्हें पाना कोई ज़िद नहीं है,
तुम्हारे बिना भी जो सच कह सकूँ,
मोहब्बत में इतनी तो ख़ुद्दारी सही है,
इश्क़ में झुकना भी दिल की अदा है,
मगर झुकना अगर शर्त हो, तो ये ठीक नहीं है?
गर मैं घुटनों के बल ना बैठूँ,
ना गुलाबों से तुम्हें सजाऊँ,
ना दुनिया के सामने हर पल,
तुम्हारे इश्क़ के क़सीदे सुनाऊँ,
तो मेरे दिल को कमतर न समझना,
मेरी ख़ामोशी को पत्थर न समझना।
मोहब्बत मेरे लिए कोई तमाशा नहीं,
जहाँ दिखावा ही इश्क़ की निशानी हो,
मैं तुम्हें दिल से चाहता हूँ,
बस इतनी-सी मेरी कहानी है।
-रतन कुमार कैथवास
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