नज़रें मिलाते हैं तो क़यामत बरपा होती है,
लब ख़ामोश हैं, मगर कोई इकरार भी नहीं।
वो रूठते हैं तो मौसम उदास हो जाता है,
मनाते हैं तो कोई शिकवा बरक़रार भी नहीं।
क्या खूब हुनर है उन्हें दिल चुराने का,
चोर हैं मगर चेहरे से कोई गुनाहगार भी नहीं।
बस एक मुस्कान से घायल कर गए हमें,
हाथ में फूल है और कोई हथियार भी नहीं।
हमने पूछा कि दिल पर हुकूमत कैसे कर ली,
हँसकर बोले… इसमें हमारा कोई इख़्तियार भी नहीं।
-रतन कुमार कैथवास
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