दीवारों से फ़र्श अड़ी है, खिड़की कहाँ से खोलें,
बंद पड़े इस कमरे में अब साँस कहाँ से अब लें।
जागती आँखें सोच रही हैं, नींद कहाँ से लाएँ,
मन के भीतर शोर बहुत है, किससे जाकर कह आएँ।
क्या कुछ टूटा, क्या कुछ छूटा… राज़ समझ न आए,
दिल चुप है पर भीतर जाने कितने नग़मे घोले।
सोच की गलियाँ भाग रही हैं, कोई मोड़ न आए,
खुद से पूछें लाख दफ़ा, जवाब मगर न पाए।
रात खड़ी है सामने और सुबह का पता नहीं,
मन में इतना कुछ जमा है, पर कहने को शब्द नहीं।
शायद कोई बात अधूरी अब भी भीतर ठहरी है,
इसीलिए तो आँख खुली है और नींद हमसे रूठी है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X