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भारतीय किसान - एक त्रासदी और पोस्टर

                
                                                         
                            इसके चेहरे पर मुस्कान रहती है,
                                                                 
                            
हमारी आँखों में नमी रहती है,
इसके हिस्से में भाषण आते हैं,
हमारे हिस्से में कमी रहती है।

इसके खेतों में वादे लहलहाते हैं,
हमारे खेतों में क़र्ज़ उगता है,
इसके नाम पर मेला सजता है,
हमारा घर भूख में उजड़ता है।

इसकी तस्वीर पर फूल चढ़ते हैं,
हमारी मेहनत पर धूल उड़ती है,
इसके हिस्से में तालियाँ आती हैं,
हमारी फ़सल औने-पौने बिकती है।

ये मंचों पर अन्नदाता कहलाता है,
हम मंडियों में दाम को तरसते हैं,
ये काग़ज़ों में ख़ुशहाल नज़र आता है,
हम मौसम के रहमोकरम पर जीते हैं।

बेटा, तस्वीरों में किसान मुस्कुराता है,
हक़ीक़त में उसका दर्द कौन बताता है?
जब तक खेत की मिट्टी से पूछोगे नहीं,
तब तक हर बैनर झूठी ख़ुशहाली दिखाता है।

किसान की ख़ुशहाली तस्वीरों से नहीं,
उसकी फ़सल के सही दाम से होगी,
जब मेहनतकश के घर चूल्हा जलेगा,
तभी असली तरक़्क़ी उसके नाम से होगी।
-रतन कुमार कैथवास
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41 मिनट पहले

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