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बहुत ऊँचे साये ढूँढते हैं

                
                                                         
                            दरिया समंदर में उतरकर दरिया नहीं रहता,
                                                                 
                            
मिलन की हद बढ़े तो उसकी रवानी खो जाती है।

हर शख़्स को उसके मुक़ाम पर रहने दो,
ज़्यादा झुकोगे तो अपनी ही कहानी खो जाती है।

जो अपने क़द से बहुत ऊँचे साए ढूँढते हैं,
धूप आते ही उनकी सारी निशानी खो जाती है।

किसी की चमक से आँखें चौंधियाने न देना,
वरना अपनी आँखों की रोशनी खो सकती है।

रिश्ते निभाओ मगर ख़ुद को मिटाकर नहीं,
हद से गुज़र जाओ तो ख़ुद से यारी खो जाती है।

अपनी ज़मीन से जुड़े रहना ऐ दिल,
हर ऊँची लहर में उतरकर गहराई नहीं मिलती।
-रतन कुमार कैथवास
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एक घंटा पहले

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