ग़रीब के हिस्से की रोटी छीनकर,
समझाया… ‘कर्मों का फल ही काया है।’
महलों में बैठकर वैराग्य पढ़ा,
फ़क़ीरों को दुनिया का पाठ पढ़ाया है।
ख़ुद रेशमी चादरों में लिपटा रहा,
नंगे पाँव चलने को धर्म बताया है।
दौलत के ढेर पर बैठकर उसने,
हर रिश्ते को झूठा बतलाया है।
ख़ुद अपनी तिजोरी भरते-भरते,
दुनिया को त्याग का अर्थ समझाया है।
मैंने पूछा… ‘ज़रा इतना तो बताओ,
ये कैसा वैराग्य तुमने कमाया है?’
वह मुस्कुराकर फिर कहने लगा,
‘अरे भाई, सब मोह-माया है!’
-रतन कुमार कैथवास
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