तुम्हारे सपनों की गैर मौजूदगी में, मैं अपना सफ़र मुल्तवी कर रहा हूँ,
तुम्हें पाने की ज़िद नहीं, बस तुम्हारे होने का असर कर रहा हूँ।
मुहल्ले से तो शिकायत कभी रही ही नहीं मुझको,
उसी की याद में तो आज भी साँसों का सफ़र कर रहा हूँ।
वही गलियाँ, वही मोड़, वही छतें हैं अब तक,
मैं हर पुराने निशान में अपना पता पूछ रहा हूँ।
जिन खिड़कियों से कभी तुम्हारी हँसी आती थी,
आज उन्हीं खिड़कियों से ख़ामोशी का शोर सुन रहा हूँ।
कहने को तो शहर ने बहुत कुछ नया दे दिया मुझे,
मगर उस पुराने मुहल्ले में अपना बचपन ढूँढ़ रहा हूँ।
तुम्हारे लौटने की कोई खबर नहीं है फिर भी,
मैं हर शाम उसी मोड़ पर कुछ देर ठहर रहा हूँ।
सफ़र मेरा था, रास्ते भी मेरे ही थे शायद,
मगर तुम्हारी याद आई तो वहीं सफ़र मुल्तवी कर रहा हूँ।
-रतन कुमार कैथवास
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