तेरी यादों की गली में जब भी कदम पड़ता है,
अपने ही शहर में जैसे बेघर हो जाता हूँ।
तुझसे मिलता हूँ तो खुद से मुलाक़ात नहीं होती,
तेरी आँखों में उतरकर तेरा असर हो जाता हूँ।
तू नहीं होती मगर तेरी कमी रहती है,
मैं हँसता भी हूँ तो अंदर से बिखर सा जाता हूँ।
तेरी ख़ामोश निगाहें जो कभी छू जाती हैं,
बिना आवाज़ के मैं एक ख़बर हो जाता हूँ।
कितना मुश्किल है तुझे भूल के अपना होना,
तेरा ख़याल आते ही फिर तेरा हो जाता हूँ।
मेरी पहचान भी अब मुझसे सवाल करती है,
मैं जहाँ में खुद को तलाशूँ, वहीं तुम हो जाता हूँ।
-रतन कुमार कैथवास
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