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आस लगी है अब

                
                                                         
                            संदर्भों की रीति बहुत है, किससे उलझें अब,
                                                                 
                            
जिसका जैसा मन हो उसका, हम क्यों समझें अब।
नाम खुदवा कर पत्थर पर, दिन-रात भजे हैं अब,
जिस राह से भोले आते हैं, उस राह सजे हैं अब।

सूने आँगन में एक दीप-शिखा जलवा देना,
अँधियारी इस रात में थोड़ी रोशनी भी कर देना।
द्वार खुला है, मन भी खुला है, आस लगी है अब,
रात बहुत है, न जाने भोले आएँगे कब।

डमरू की आवाज़ कहीं से कानों में पड़ जाए,
चाँद की ओट से कोई त्रिशूल अचानक दिख जाए।
नंदी से भी पूछ लिया है… कब लौटेंगे शंकर अब,
रात बहुत है, आँखें जागें… आएँगे भोले कब?
-रतन कुमार कैथवास
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4 घंटे पहले

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