यूं ही नहीं सूरज ने अगन बढ़ाई होगी,
धरती में तपन कहीं से तो आई होगी ,
उम्मीदों की शाख पर
यकीं की कलियाँ मुरझाई होंगी ,
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
चादरें रहमतों की इंसा के सर से,
कुदरत ने यूं ही नहीं हटाई होंगी।
परिंदों ने यूँ ही नहीं रास्ते बदले होंगे,
आँधियों ने भी कई घोंसले निगले होंगे,
पेड़ों ने पत्तों को गिराने से पहले
हज़ार बार हाथ अपने मलें होंगे,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
जो पतझड़ ने बहारों से आँखें चुराई होंगी।
यूँ ही नहीं समंदर का पानी खारा हुआ होगा,
नदियों ने अपना हर दर्द उसमें बहाया होगा,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
पिता की मोहब्बत की तरह
बच्चों की तमाम तकलीफें
समंदर ने भी ख़ुद में समाई होंगी।
कामयाबी यूँ ही नहीं चेहरे पे नूर लाती है,
मुस्कुराहट यूँ ही नहीं बेख़ौफ़ नज़र आती है,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
जो जगमगाते चेहरे के पीछे
किसी टूटे हुए ख़्वाब की किरचें दबाई होंगी।
यूँ ही नहीं रूह को सुकून नसीब होता है,
इंसान ने भी कहीं ख़ुद से हार मानी होगी,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
जो सजदों में झुके सिर ने तमाम तकलीफ़ें अपनी ,
चुपके से ऊपर वाले को सुनाई होंगी।
-रश्मि जोशी
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