आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मजबूरियाँ

                
                                                         
                            यूं ही नहीं सूरज ने अगन बढ़ाई होगी,
                                                                 
                            
धरती में तपन कहीं से तो आई होगी ,
उम्मीदों की शाख पर
यकीं की कलियाँ मुरझाई होंगी ,
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
चादरें रहमतों की इंसा के सर से,
कुदरत ने यूं ही नहीं हटाई होंगी।

परिंदों ने यूँ ही नहीं रास्ते बदले होंगे,
आँधियों ने भी कई घोंसले निगले होंगे,
पेड़ों ने पत्तों को गिराने से पहले
हज़ार बार हाथ अपने मलें होंगे,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
जो पतझड़ ने बहारों से आँखें चुराई होंगी।

यूँ ही नहीं समंदर का पानी खारा हुआ होगा,
नदियों ने अपना हर दर्द उसमें बहाया होगा,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
पिता की मोहब्बत की तरह
बच्चों की तमाम तकलीफें
समंदर ने भी ख़ुद में समाई होंगी।

कामयाबी यूँ ही नहीं चेहरे पे नूर लाती है,
मुस्कुराहट यूँ ही नहीं बेख़ौफ़ नज़र आती है,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
जो जगमगाते चेहरे के पीछे
किसी टूटे हुए ख़्वाब की किरचें दबाई होंगी।

यूँ ही नहीं रूह को सुकून नसीब होता है,
इंसान ने भी कहीं ख़ुद से हार मानी होगी,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
जो सजदों में झुके सिर ने तमाम तकलीफ़ें अपनी ,
चुपके से ऊपर वाले को सुनाई होंगी।
-रश्मि जोशी 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर