बचपन का ज़माना क्या अनबूझ सी पहेली है
खेला तो खिलौना था बूझा तो जवानी है,
दौड़े तो तितलियों को हाथों में थामना था
थामा तो साथ अपने इच्छाएं सुहानी है
सोचा तो पतंग सा था, कि पल में खींच लेंगे,
पाया तो पतंगे सा कुछ पल की कहानी है,
यादों कि भीगी शाखों पर फूल खिल खिलाये,
हाथों की छूअन से पर पल में ही मुरझाये,
कुछ गीत बन के ऐसे मन में हैँ समाये,
जब जी चाहा जीभर के हमने गुनगुनाए,
यादों का खज़ाना भी कितना है अनूठा
बचपन की गिलेहरियां भी है रोज़ मिलने आती,
फूलों से तबस्सुम के
कांटों से कुछ चुभन के,
जो एहसास साथ सीखे
साथी जो हुए तो वो ही,
कभी फूल से मुलायम तो
कभी कांटों से बन के चुभे
बचपन न कुछ और था
एहसासों की पाठशाला
जहाँ रूपकों से हमने जानी जगत की गीता।
-रश्मि जोशी
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