क्या बाढ़ में सिर्फ असम डूबा या देश का भविष्य ही डूब रहा?
ये है देश का भविष्य,
कैसे बन पाएँगे देश के भविष्य-निर्माता?
उनकी किताबें हैं डूबी,
उनके सपने हैं डूबे,
किसानों के खेत हैं डूबे,
उनकी मेहनत है डूबी।
वो अपनी किस्मत को कोसें या बाढ़ को?
फिर सैलाब के बाद उठते हैं,
नई उम्मीद के साथ जीते हैं।
फिर से शून्य से शुरुआत करते हैं।
अँधेरी रात के बाद कल सवेरा भी आएगा,
ये उम्मीद मन में रखते हैं।
दिल के टुकड़े लिए हैं बैठे,
आँखों में नमी-सी छाई है।
पानी के बहाव को कम होते देखते,
फिर नई किरण के साथ जीते।
हारकर भी खड़े होने की हिम्मत ये रखते हैं।
हम तो छोटी-सी बात से ही बिखर जाते,
इनका तो पूरा जीवन ही बदल जाता है।
फिर शून्य पर आ जाते हैं,
और शून्य से फिर उठ खड़े होने की ताकत रखते हैं।
कल जहाँ बच्चों की मस्ती/खुशी थी खिलती,
वहाँ आज लहरों की आवाज़ है गूँजती।
वो आँगन आज दिखता नहीं,
ना जाने कहीं बिखर-सा गया।
बच्चों की भूख आँखों में दिखती,
माँ की ममता भी मायूस-सी होती।
बाप की आँखों में बेबसी है छाई,
पर गलती इसमें उनकी नहीं,
किन्तु उनका तो सब कुछ डूब गया।
किनारे पर बैठे अपने घर को डूबते देखा,
ना जाने कितने परिवारों को डूबते देखा।
ना जाने वहाँ कितनी तड़प, कितनी तबाही,
कितनी मजबूरी, कितना दर्द, कितनी परेशानी होगी—
बाढ़ केवल घर नहीं डुबोती,
वह डुबोती है मेहनत, सपने,
परिवार, सहारा, जीविका अर्थात् पूरा जीवन।
पानी तो एक पल में सब कुछ बहा ले जाता है,
लेकिन पीछे छोड़ जाती है ऐसी ज़िंदगी,
जिसे फिर से बसाने में बरसों लग जाते हैं।
फिर वही सवाल मन में आता है—
क्या केवल असम डूबा,
या किसी का सहारा भी डूब गया?
क्या केवल घर और खेत ही डूबे,
या हमारे देश के भविष्य-निर्माता भी?
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