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मक़सद तो रस लेने का था ,

                
                                                         
                            कलियों से फूल देखो खिल रहे ,
                                                                 
                            
अद्भुत सौंदर्य देखो मिल रहे ।
फूलों को देख भंवरें गाने लगे ,
मानो फूलों को भंवरें मनाने लगे ।
भंवरे को देख फूल शर्माने लगे ,
गाने , मनाने से मुस्कुराने लगे ।
भंवरे तू प्यार जताने आया ,
गाना, गुनगुनाना बहाना किया ।
मक़सद तो रस लेने का था ,
पर सीधे - सीधे तू बता न सका ।
दो दिन बाद फूल मुरझा गए ,
भंवरे का अब ठिकाना न था ,
क्योंकि फूल अब रसहिन जो था ।।
- रंजीत कुमार महतो "गम्हरा"
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7 घंटे पहले

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