नारी
सबकी चर्चित कथा, मैं ईश का रहस्य वरदान
पर मैं भी हूँ तुम सबमें एक समान।
आकाश और पृथ्वी के बीच क्यों रहस्य बनू मैं
जब अम्बर अवनी क्षितिज भी है मेरे पास।
नहीं चाहिए मुझको उपमा, उपमेय, अलंकार
नारी की है ए कातर चित्कार।
अब न लिखो मुझपे ऐसी कहानी
"आँचल मे दूध आँखों में पानी"।
न मैं अमल न मैं कमनीय गात
न रूप का रसमय निमन्त्रण।
न मैं पद्मावत की पद्मावती
न महादेवी की दु:खद प्रियतमी।।
शैल निर्झर नहीं मैं जो जलनिधि मे मिलूँगी
हूँ बहती सरिता बहती ही रहूँगी।।
स्वच्छन्द हूँ....स्वर्ण की प्रतिमा
में न ढालो मुझको
गगन की शून्यता में
आवाज अपनी बिखेरूँगी।
- रंजना वर्मा
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