ग़रीबी फ़क़त आंकड़ों में मिटा के
कमीनी हुकूमत हँसी खिलखिला के
न जाने हवाओं को क्या मिलता होगा
चराग़ों को बेवक़्त पल में बुझा के
कभी मेरी बुनियाद पर भी तो सोचो
बुलन्दी मिली है बहुत कुछ लुटा के
किसी को हँसा के किसी को रुला के
मैं परदेश आया हूँ आँसू छुपा के
ग़ज़ल मेरी अब भी पहली मुहब्बत है
मैं सोता हूँ इसको ही दिल से लगा के
-राम नाथ बेख़बर
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