आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फिर वो सुबह भी आयेगी

                
                                                         
                            कुछ वक्त के थपेड़ों से जिन्दगी रुकती नहीं
                                                                 
                            
पथ अंधेरे हों मगर रोशनी थकती नहीं,
हैं यहाँ चाँद भी, सूरज भी चमक रहा
हो यहाँ जितना तिमिर नभ संग तारे दमक रहा,
इक हवा का रुख यहाँ दिग्भ्रमित सा हो गया
मगर वक्त ये ना समझ ले वो विजित हो गया ।
हवाओं का रुख यहाँ यूँ हमें नहीं तोड़ सकता
वक्त का दरिया भी हमको यूँ नहीं रोक सकता,
दर्द का सागर यहाँ भले ही गहरा हो गया
भले ही कुछ वक्त को मानव गम में खो गया ।
मगर ये इक युद्ध है, जो तिमिर विरुद्ध है
मार्ग हमको खोजना है जो अभी अवरुद्ध है
साथ सबको लायेंगे, मानवता को जगायेंगे
हो अभी भले निराशा, उम्मीद का सूरज लायेंगे,
ना थकेंगे, ना डरेंगे, ना झुकेंगे हम कभी
साथ चलेंगे, साथ लड़ेंगे, साथ जीतेंगे हम सभी,
फिर वो सुबह भी आएगी, रोशनी भी लाएगी,
प्रेम और सौहार्द का राग सुन्दर गाएगी ।

- डॉ. रामनाथ केसरवानी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर