प्यारी गौरैया
आँगन में चीं-चीं करती थी,
मेरे जी में मिश्री भरती थी।
कभी जाती थी मुंडेरों पर ,
तो आती कभी झरोखों पर ।
तेरी गाथा गाती मैया,
कहाँ चली गयी गौरैया।।
तेरे चीं-चीं आवाजों का शोर,
कौन ले गया तुमको चोर ।
फिर मेरे आँगन में आना,
दूँगा तुमको पानी दाना ।
साथ में होगा मेरा भैया,
कहाँ चली गयी गौरैया ।।
माँफ करो मेरी गलती तुम,
आओ मेरे साथ चलो तुम ।
छत पर दाना- पानी रख दूँगा,
कोई गलती नहीं करूंगा ।
ले रही शपथ मेरी मैया,
कहाँ चली गयी गौरैया ।।
हिमांशु व प्रिया, सैंट मैरिज स्कूल, ज़मानियाँ, गाज़ीपुर
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X