आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुक्तछंद- ।। पूरी शिद्दत के साथ ।।

                
                                                         
                            मां का रोम-रोम गुदगुदाता है / बच्चे का भविष्य।
                                                                 
                            
मां डूब जाती है इन्द्रधनुषी सपनों में
कुछ कल्पनाएं करती है मां
लगातार वसंत बुनती है मां
मां के दिमाग में उतरती है
एक चमचमाती एम्बेस्डर कार
जिसमें बैठी होती है मां।

उसका गोबर लिपा घर, चिंदीदार धोती
बदबू-भरा ब्लाऊज, टूटा हुआ पलंग...
एक-एक कर पीछे छूटते जाते हैं लगातार.....

अब मां पहने है नायलोन की साड़ी
ढेर सारे आभूषण।
उसका बेटा चला रहा है कार
दिखा रहा है वह भव्य इमारत
जहां वह एक कम्पनी का मैनेजर है
सब ठोक रहे हैं उसे सलाम।

खुश होती है मां... मुस्काती है मां
उसके दिमाग में उतरती है एक साफ-सुथरी
बाग-बगीचों वाली एक कोठी...
सोफा सैट, टी.बी., कूलर
फ्रिज, रेडियो, हीटर के साथ
मां डूबती है और भी कल्पनाओं में....
उसका बेटा लाया है चांद-सी बहू
शरमीली नटखट शोख.......

खुश होती है मां....मुस्कराती है मां
उसका रोम-रोम गुदगुदाता है
बच्चे का भविष्य।
बच्चा लिख रहा है
अ--आ--ई-इ- 1—2—3---
मां की आखें ताकती हैं
बच्चे की पूरी शिद्दत के साथ
मां के दिमाग में उतरता है बच्चा
जवान होकर।
-रमेशराज
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर