हिंदी फैले विश्व में, है अपना अरमान ।
पढ़े'',लिखे', बोले' सभी, हो इसका सम्मान ।।
हो इसका सम्मान, विदेशो' में भी बोले' ।
भारत मां के लाल, स'ग हिंदी के हो ले' ।।
जननी का गौरव है इससे, है माथे की बिंदी ।
हिंदुस्तानी नहीं, अगर वह, बोल ना पाए हिंदी ।।
भारत की बोली अलबेली ठौर- ठौर पर बदल रही है ।
प्रांत एक, पर,गांव शहर में, बोली एक नहीं है ।।
भाषा, भाई,प्रांत न छूटे, ममता की मजबूरी है ।
हि'दी को अपना लो भाई,अब तक प्रगति अधूरी है ।।
रही शहीदों की यह भाषा,ना कोई खाना पूरी है ।
एक सूत्र में बंधने खातिर, भाषा एक जरूरी है ।।
देशाटन या तीर्थाटन पर जाते हैं जो लोग ।
उन्हें असर ज्यादा करता है,बहुभाषा का रोग ।।
बहुभाषा का रोग,समझ ना आवे बोली ।
मूक बधिर सी हरकत होती, करते लोग ठिठोली ।।
भाषा अगर एक, राष्ट्र की, कुछ तो होगा अपनापन ।
हिंदी बोले', हिंदी सीखें, सुगम बनेगा देशाटन।।
मातृभाषा बोलिए इसमें ना कोई दोष है ।
राजभाषा के लिए भी, दिल में रखना कोष है। ।
स्र्वार्थ के खातिर न कैवल, प्यार से अपनाइए ।।
ग्राह्य दिल मे' कर इसै, शीर्ष तक ले जाइए ।
मातृभाषा मनुज की, ममता भरी मुस्कान है ।।
राष्ट्रभाषा सीखना, निज राष्ट्र का सम्मान है ।।
हिंदी भाषा हिंद की बोले' ना सब लोग ।
हम फैलावे'गे इसे, ज्योँ संक्रामक रोग ।।
ज्योँ संक्रामक रोग, पड़ोसी भी, न बचता ।
दे अंग्रेजी छोड़, बने प्रिय हिंदी वक्ता ।।
तकनीकी या विधि शिक्षा में, ना कोई पाबंदी ।
सरल सुसंकृत भाष्य, बने जन-जन की हिंदी ।।
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