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प्रत्युत्तर

                
                                                         
                            सृष्टि के आदिकाल से
                                                                 
                            
एक प्रश्न अनवरत है—
कौन किसे पुकार रहा है?
कौन किसका प्रत्युत्तर है?

निस्तब्ध शून्य ने पूछा था
अस्तित्व से—
“तुम हो भी या केवल संभावना?”
और अनंत विस्तार में
ऊर्जा की पहली धड़कन ने
जैसे कह दिया—
“मैं हूँ।”

तब से यह ब्रह्मांड
प्रश्नों और प्रत्युत्तरों का
एक विराट संवाद है।

तारा जलता है—
तो अंधकार प्रत्युत्तर देता है,
सूर्य ऊर्जा देता है—
तो पृथ्वी जीवन लौटाती है,
बादल बरसते हैं—
तो बीज अपनी हरियाली से
आकाश को धन्यवाद देता है।

शायद फूल का खिलना भी
वसंत का प्रत्युत्तर है,
और पतझड़—
वृक्ष का समय को दिया
एक मौन उत्तर।

नदी से पूछो—
“तुम चलती क्यों हो?”
वह ठहरकर नहीं समझाती,
बस बहती जाती है।

उसका बहना ही
उसका प्रत्युत्तर है।

विज्ञान ने भी
प्रकृति से प्रश्न किए,
और प्रकृति ने
सूत्रों में उत्तर लिखे।

गिरता हुआ सेब
सिर्फ फल नहीं था,
वह गुरुत्व के प्रश्न का
दृश्य प्रत्युत्तर था।

पदार्थ को बाँटा
तो परमाणु मिला,
परमाणु को टटोला
तो कणों का संसार मिला,
कणों से आगे बढ़े
तो अनिश्चितता खड़ी मिली।

हर उत्तर के पीछे
एक नया प्रश्न था—
और हर प्रश्न के भीतर
अगले ज्ञान का बीज।

यही तो विज्ञान है—
उत्तर को अंतिम सत्य न मानना,
बल्कि उत्तर से
नया प्रश्न जन्म देना।

एक रासायनिक पात्र में
दो पदार्थ मिले,
अणुओं ने पुनर्विन्यास किया,
बंधन टूटे,
नए बंध बने—
और पदार्थ ने
परिवर्तन के रूप में
अपना प्रत्युत्तर दिया।

साम्यावस्था में भी
प्रकृति सोती नहीं,
दोनों दिशाओं में
अदृश्य यात्राएँ चलती रहती हैं।

संतुलन का अर्थ
गतिहीनता नहीं,
बल्कि विपरीत गतियों का
सूक्ष्म समन्वय है।

शायद जीवन भी
ऐसी ही कोई
गतिशील साम्यावस्था है।

एक कोशिका को
बाहर से संकेत मिलता है,
झिल्ली उसे पहचानती है,
रासायनिक संदेश भीतर दौड़ता है,
जीन अपनी भाषा में
प्रत्युत्तर लिखते हैं—
और जीवन
एक क्षण में
अपना व्यवहार बदल देता है।

प्रकाश की ओर
पौधे का झुकना,
स्पर्श पर लता का लिपटना,
गर्मी में पत्तियों का व्यवहार बदलना—
प्रकृति की हर संवेदना
अपने ढंग का प्रत्युत्तर है।

मनुष्य भी
संकेतों का बना हुआ प्राणी है।

एक आवाज
हृदय की गति बदल सकती है,
एक स्मृति
पूरे वर्तमान को बदल सकती है,
एक शब्द
किसी के भीतर
आशा जगा सकता है,
और वही शब्द
किसी दूसरे के मन में
दीवार भी खड़ी कर सकता है।

इसलिए
शब्द बोलने से पहले सोचो—
हर शब्द
सिर्फ ध्वनि नहीं होता,
वह किसी चेतना पर
डाला गया एक संकेत होता है।

और चेतना
प्रत्युत्तर देती है।

माँ की पुकार पर
बच्चे का लौटकर देखना,
गुरु के विश्वास पर
शिष्य का बदल जाना,
एक मुस्कान पर
दूसरी मुस्कान का जन्म लेना—
ये सब
मानव सभ्यता के
सूक्ष्मतम प्रत्युत्तर हैं।

कभी-कभी
प्रत्युत्तर शब्दों में नहीं आता।

आँखें बोलती हैं,
मौन उत्तर देता है,
दूरी अपना अर्थ कहती है,
और प्रतीक्षा
सबसे लंबा प्रत्युत्तर बन जाती है।
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14 घंटे पहले

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