*पत्थरों में फण, संस्कृति में प्राण*
~डॉ रामानुज पाठक सतना म प्र
नाग केवल नाग नहीं—
वह धरती की धड़कन है,
जल की गहराई का मौन रहस्य,
वर्षा की प्रतीक्षा में बैठी
किसान की आँखों का विश्वास है।
वह भय का आकार लेकर भी
अभय का संदेश देता है,
विष को धारण करके भी
जीवन की रक्षा का अर्थ कहता है।
शायद इसीलिए
भारतीय शिल्पकार ने उसे
मंदिर की दीवार पर नहीं,
अपनी सभ्यता की स्मृति पर उकेरा।
कहीं वह शेष बनकर
अनंत आकाश को थामता है,
कहीं शिव के कंठ में लिपटकर
मृत्यु के भय को चुनौती देता है।
कहीं वासुकि बन
समुद्र की अतल गहराइयों को मथता है,
तो कहीं किसी कुएँ, बावड़ी या सरोवर के किनारे
जल की पवित्रता का प्रहरी बन बैठता है।
नाग के फण में
सिर्फ विष नहीं,
वर्षा का संकेत भी पढ़ा गया;
उसकी धरती से निकटता में
केवल रहस्य नहीं,
उर्वरता का स्वप्न भी देखा गया।
इसलिए नागपंचमी
केवल नाग की पूजा का पर्व नहीं—
यह मनुष्य के उस पुराने बोध का उत्सव है
कि धरती पर हमारा अधिकार नहीं,
हमारा संबंध है।
जिस मिट्टी से अन्न उगता है,
जिस जल से जीवन चलता है,
जिस वन में अनगिनत जीव साँस लेते हैं,
उस प्रकृति को देवत्व देना
दरअसल स्वयं अपने जीवन को
पवित्र मानना है।
मंदिरों के पत्थरों पर उकेरे गए
नाग इसलिए आज भी जीवित हैं।
उनकी आँखें हमें देखती हुई पूछती हैं—
क्या तुमने प्रकृति को जीत लिया,
या उसके साथ जीना अभी सीखा ही नहीं?
हजारों वर्ष पुरानी शिल्पकला
आज के मनुष्य के लिए
एक अत्याधुनिक संदेश छोड़ जाती है—
जल बचाओ,
वन बचाओ,
जीव-जगत का सम्मान करो;
क्योंकि प्रकृति के किसी एक सूत्र को तोड़ोगे
तो जीवन की पूरी माला बिखर सकती है।
नागपंचमी पर
नाग को दूध चढ़ाने से अधिक आवश्यक है
उसके वास्तविक आवास को बचाना;
मूर्ति के आगे सिर झुकाने से अधिक आवश्यक है
उस जीवित प्रकृति के आगे विनम्र होना
जिसमें नाग भी है,
नदी भी,
वृक्ष भी
और मनुष्य भी।
नाग फण उठाए खड़ा है—
मानो कह रहा हो :
मुझे देवता बनाने से पहले
मुझे जीव रहने दो।
यही नागपंचमी का
सबसे गहरा मंत्र है—
सह-अस्तित्व ही संस्कृति है,
प्रकृति-सम्मान ही सभ्यता है,
और जीवन के प्रत्येक रूप की रक्षा
मानवता की सबसे बड़ी पूजा है।
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