“कारवाँ ही रुक गया
जब हम खड़े हुए
मुड़के हमने देखा तो
सब थे डरे हुए!
पाप पुण्य छिन्न भिन्न
करते जो चले
लगते हैं फिर आज वो
खुद ही मरे हुए!
कारवाँ ही ….. ।
थी ना कोई आस और ना प्यास ही हमको
इस ज़माने पर ना था विश्वास ही हमको
सब हमारे!
सब हमारे, हम मगर किसी के ना हुए
अपनाया हमने जिनको भी
वो खुश नसीं हुए!
कारवाँ….. ।
ज़िन्दगी के अपने गम
फिर भी ना कम हुए
जो आगे बढ़ा कारवाँ
तो और सितम हुए
लोग इस जहां में
बड़े बेरहम मिले
लुट गये हम राह में
जहाँ पैर कम हुए!
हाँ जी कारवाँ ही रुक गया
जब हम खड़े हुए….. ।
लूटने वालों से ना कोई बैर था मेरा
कारवाँ के बीच में ही पैर था मेरा
अपने ही थे सब
कारवाँ के प्रहरी बने हुए
लूट करके खुद ही वो
फिर भागे खड़े हुए!
कारवाँ ही…. ।
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