मां शक्ति का दूजा स्वरूप ब्रह्मचारिणी कहलाता है।
नवरात्रि के दूसरे दिन इनको ही पूजा जाता है।।
जब शक्ति अवतरित हुईं मुनि नारद का आगमन हुआ।
जाएंगी ब्याही शिव से ये मां मैना को यह बचन कहा।।
सुन नारद मुनि की वाणी उमा ने करी तपस्या कठोर।
लेकर हाथ में माला व कमण्डल गईंं जंगल की ओर।।
हजार वर्ष फल-फूल खाया सौ वर्ष शाक खाकर बिताया।
त्यागा है जब पत्तों को खाना नाम अपर्णा कहलाया।।
सब देवों ने करी तप की प्रशंसा शिव जी हुए प्रसन्न।
हंसी- खुशी के साथ शिव संग ब्याह हुआ सम्पन्न।।
तप करने के कारण मां ब्रह्मचारिणी कहलाईंं।
शिव को पाकर पति स्वरूप हैं कैलाश पर आईं।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X