किसी सर्द रात में दो बजे
जब मैं अपने कमरे से निकल के
तिराहे वाली चाय की दुकान पर
जा पहुँचुंगा चाय की तलाश में
और मिलेगी वो दुकान बंद मुझे
उस वक़्त मैं बिना नसीब को कोसे
और बिना दुकानदार को गालियां दिए
लौट आऊंगा अपने कमरे पर
और बड़े इत्मीनान से
मोबाइल में सहेजी हुई
तुम्हारी तसवीर को चूमते हुए
महसूस करना चाहूंगा
चाय के ज़ायके को
और मुझे उम्मीद है कि
उस दिन मुझे नसीब होगी
अपने ज़िन्दगी की
सबसे कड़क चाय।
- रक्षित मिश्रा
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