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सौदा जहां ज़मीर का होता हो रात-दिन

                
                                                         
                            घायल न कर दें दिल को निगाहों के वार से ।
                                                                 
                            
उनसे कहो न देखा करें इतने प्यार से।

मोहताज इश्क़ की नही बैसाखियों के हम,
परहेज़ भी नहीं है मगर प्यार-व्यार से।

सौदा जहां ज़मीर का होता हो रात-दिन,
रखती नहीं मैं वास्ता ऐसे दयार से।

कितना सुकून मिलता है खो कर करार को,
पूछे तो कोई आके दिल-ए-बे-क़रार से।

कमतर किसी भी शय को नहीं आंकिए जनाब,
पत्थर भी टूट जाते हैं बूंदों की मार से।

मौसम ख़ुशी के बुन लिया करती हूँ ख़ुद-ब-ख़ुद,
रखती नहीं उमीद मैं ज़्यादा बहार से ।

आख़िर बला है क्या कोई समझाए "अल्प" को
वाक़िफ़ तो हम भी हों ज़रा इश्क़-ए-ख़ुमार से।
- राखी "अल्प"
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35 मिनट पहले

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