घायल न कर दें दिल को निगाहों के वार से ।
उनसे कहो न देखा करें इतने प्यार से।
मोहताज इश्क़ की नही बैसाखियों के हम,
परहेज़ भी नहीं है मगर प्यार-व्यार से।
सौदा जहां ज़मीर का होता हो रात-दिन,
रखती नहीं मैं वास्ता ऐसे दयार से।
कितना सुकून मिलता है खो कर करार को,
पूछे तो कोई आके दिल-ए-बे-क़रार से।
कमतर किसी भी शय को नहीं आंकिए जनाब,
पत्थर भी टूट जाते हैं बूंदों की मार से।
मौसम ख़ुशी के बुन लिया करती हूँ ख़ुद-ब-ख़ुद,
रखती नहीं उमीद मैं ज़्यादा बहार से ।
आख़िर बला है क्या कोई समझाए "अल्प" को
वाक़िफ़ तो हम भी हों ज़रा इश्क़-ए-ख़ुमार से।
- राखी "अल्प"
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