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सजाने चला हूँ

                
                                                         
                            तुमको तुम्हीं से चुराने चला हूँ।
                                                                 
                            
उम्मीदें तुम्हारी सजाने चला हूँ।

कहीं टूट जाये ना साँसों की डोरी,
जीने की चाहत जगाने चला हूँ।

बावरा मन भटकता रहा उम्र भर
'दिया' ज्ञान का जलाने चला हूँ।

मुहब्बत की नदी जो सूखी हुई है,
भागीरथ सा गंगा को लाने चला हूँ।

अपने जीवन से बेजार जो हो गए हैं,
उन्हें जीवन की राहें दिखाने चला हूँ।

हमारे बुजुर्ग हमारे जन्मदाता है जो,
उनके सपनों को सच बनाने चला हूँ।

एक तुमसे मुहब्बत हम करते रहे हैं,
अब तेरे प्यार को गुनगुनाने चला हूँ।

तुमसे ही जीवन तुम्हीं जिंदगानी,
'राकेश' सारे वादे निभाने चला हूँ।

© राकेश कुमार सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

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