ये जो भोर की लाली, क्षितिज ने सजाली,
स्वयं में गीत है, संगीत है, है जैसे किसी पीर की कव्वाली!
ये ज़मीन-आसमान को मिलाती है
नामुमकिन को मुमकिन दिखाती है!
देख, सूरज भी थोड़ा मंद है,
मन में एक द्वंद्व है,
खो जाऊँ इस क्षण में,
या फिर से भरूँ तपिश कण-कण में!
ये ठंडक उसे भी लुभा रही है,
भोर की आभा प्रीत यूँ लुटा रही है
कि जलन कुछ कम हो सूरज की भी,
सारे जतन जुटा रही है!
अब नियति है, सूरज की, उगना भी, जलना भी,
संध्या की ओर चल के, ढलना भी!
नियति निर्धारित है तो घटित निश्चित है,
जीवन है तो मृत्यु सुनिश्चित है,
अंत:अस्ति:आरंभ ही अटल सत्य है,
मृत्यु ही मोक्ष का मार्ग करती प्रशस्त है!
तुम भी सूरज सा बनना, आगे बढ़ना,
तपिश में जलना, संध्या की ओर चलके, ढलना
जीवन नहीं, मात्र एक क्षण है, भोर की लालिमा का चढ़ना!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X