आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इमरजेंसी 1975..

                
                                                         
                            दोपहर के पत्ते सिर झुकाए थे किसी रहमदिल झोंके के इंतजार में
                                                                 
                            
उस दिन सूरज चमकता रहा और शहर गिरते गए अन्धकार में |
अखबारों की सुर्खियां बिन बिजली के काग़ज़ पर अधूरी रह गईं
सुबह बदहवास, संसद बेकार, सच की हर सांस सहमी रह गई |

हम किताबों में रोशनी तलाशते रहे, और दोपहर हम पर हंसती रही
हम सही मौके ढूंढते रहे, और ज़ंजीरे हमारे दिमाग को जकड़तीं गईं |
ट्रेन सही समय पर चलने लगी, तो लोग उसे इंक़लाब मानने लगे
दिल्ली में गरीब बस्तियाँ टूटने लगी, तो लोग उसे पुनर्वास जानने लगे |

उस दोपहर जेपी ने इक डरा हुआ, इक हारा हुआ, लोगों का समुंदर देखा
आसमान से टूट कर बिखरी शाखें, ढहती इमारतों के मलबे का बवंडर देखा |
हर जंग से जो भागते हैं ज़िन्दा रहने के लिए, ऐसे भगोड़ों का मंजर देखा
जो अपना गाँव लुटेरों को सौंप दे, ऐसे पंचों के प्रपंच का पुराना खंडहर देखा |

इस दौर का ज़िक्र जब जब हुआ, सफेद खादी में लिपटे जुआरी याद आते रहे
जीतने की चाह में सावन को दांव पर लगाते गए, आसमां से नज़र चुराते रहे |
उनके कारनामों को भूल पाना मुश्किल, लेकिन उनके चेहरे धूल में मिटते गए
समंदर को वो कैद न कर पाए, हालांकि अंधेरे में कप्तान कश्तियां डुबोते गए |
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर