दोपहर के पत्ते सिर झुकाए थे किसी रहमदिल झोंके के इंतजार में
उस दिन सूरज चमकता रहा और शहर गिरते गए अन्धकार में |
अखबारों की सुर्खियां बिन बिजली के काग़ज़ पर अधूरी रह गईं
सुबह बदहवास, संसद बेकार, सच की हर सांस सहमी रह गई |
हम किताबों में रोशनी तलाशते रहे, और दोपहर हम पर हंसती रही
हम सही मौके ढूंढते रहे, और ज़ंजीरे हमारे दिमाग को जकड़तीं गईं |
ट्रेन सही समय पर चलने लगी, तो लोग उसे इंक़लाब मानने लगे
दिल्ली में गरीब बस्तियाँ टूटने लगी, तो लोग उसे पुनर्वास जानने लगे |
उस दोपहर जेपी ने इक डरा हुआ, इक हारा हुआ, लोगों का समुंदर देखा
आसमान से टूट कर बिखरी शाखें, ढहती इमारतों के मलबे का बवंडर देखा |
हर जंग से जो भागते हैं ज़िन्दा रहने के लिए, ऐसे भगोड़ों का मंजर देखा
जो अपना गाँव लुटेरों को सौंप दे, ऐसे पंचों के प्रपंच का पुराना खंडहर देखा |
इस दौर का ज़िक्र जब जब हुआ, सफेद खादी में लिपटे जुआरी याद आते रहे
जीतने की चाह में सावन को दांव पर लगाते गए, आसमां से नज़र चुराते रहे |
उनके कारनामों को भूल पाना मुश्किल, लेकिन उनके चेहरे धूल में मिटते गए
समंदर को वो कैद न कर पाए, हालांकि अंधेरे में कप्तान कश्तियां डुबोते गए |
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