आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इन दिल के बिखरे पन्नो को,

                
                                                         
                            इन दिल के बिखरे पन्नो को,
                                                                 
                            
....कुछ यादों को कुछ अपनों को(2),
कैसे अब मैं समेटुंगा,
....कुछ यारों को कुछ सपनों को (2),
वो पल भी कुछ काम का था,
....खुशियों का कोई दाम ना था,
अब फीकी फीकी सारी दुनिया,
....कैसे अब मैं समेटूंगा,
उन खुशियों में क्या फिर लौटूंगा,
उन खुशियों में क्या फिर लौटूंगा,
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर