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ज़िंदगी की सवारी

                
                                                         
                            सुबह हो या शाम, धरती हो या चांद,
                                                                 
                            
सफर तो जारी है,
कुछ नायाब पाने, कहीं पहुँचने का जुनून
ज़हन पर दिन-रात तारी है,
मंज़िल भी है, पहुँचना भी है पर,
राह का नक्शा है नदारद,
ऊपर को चले नीचे भी, सीधी तो नहीं तिरछी ही,
पर है मज़े की ये ज़िंदगी की सवारी.

 
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5 घंटे पहले

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