हूँ प्रतीक्षा में मैं भी कि यह
विस्तृत कुहासा छटेगा,
अवरुद्ध कंदराओं में जीवन की
जीवन का दीपक जलेगा,
आएगी पुरवाई किसी दिशा से
शांति की गंध लेकर,
प्राणियों को न्याय एवं क्षुधा को
दाना मिलेगा.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X