ज़रुरी तो नहीं मालिक-ए-मयख़ाना
मय का शौक़ीन हो,
सजा कर रखता है जाम-ओ-मीना को,
कहीं मयख़ाने की तौहीन हो.
इक लय रहे सुरुर में,
होश खो कर भी रहे ख़बरदारी,
ऐ आशिक़-ए-मय आ ज़रा,
कुछ लमहों को परे रख दें समझदारी.
तेरी आंखों के डोरे बता रहे,
करवटों के संग रात तूने ग़ुज़ारी है,
चला आया कर खुले दरवाज़े,
मयख़ाने ने हमेशा ही निभाई नातेदारी है.
न रख साग़र को कभी ख़ाली ऐ साक़ी,
यह मनहूसियत की निशानी है,
दो घूंट बचा रखा कर बोतल में,
वही सहारा रात का फक़त होने वाली है.
बड़ी इज़्ज़त हमारी तिरे दरवाज़े ऐ साक़ी,
हर शख़्स झुककर सलाम देता है,
नाम जिनका लिया करते थे शीरीं ज़ुबाँ से,
वही आज ब-मुश्किल सलाम लेता है.
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