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एक स्पर्श था—या कोई सपना,

                
                                                         
                            मेरे अल्फ़ाज
                                                                 
                            

एक स्पर्श था—या कोई सपना,
जो पल भर में अपना हो गया,
सूना मन जैसे वन-उपवन,
फिर से फूलों-सा हो गया।

सूनी राहों पर धूप उतर आई,
मन की वीणा फिर झंकृत हुई,
बुझी हुई आँखों में जैसे
एक नई-सी ज्योति प्रकट हुई।

जिसे समय ने छीन लिया था,
वह विश्वास कहीं से लौट आया,
सूखे अधरों पर मुस्कान बनी,
मन ने फिर से गीत सुनाया।

बिन बोले कुछ कह गया कोई,
बिन छुए मन छू गया कोई,
जैसे पतझड़ के आँगन में
चुपके से मधुमास उतर आया।

एक स्पर्श था—या कोई सपना,
जो पल भर में अपना हो गया,
सूना मन जैसे वन-उपवन,
फिर से फूलों-सा हो गया।

अब हर साँस में रंग घुला है,
हर धड़कन में उजियारा है,
कल तक जो जीवन सूना था,
आज वही सबसे प्यारा है।

कौन कहे यह प्रेम था या
मन का कोई मौन इशारा,
एक पल ने बदल दिया जैसे
जीवन का सारा अर्थ हमारा।

एक स्पर्श था—या कोई सपना,
जो पल भर में अपना हो गया,
सूना मन जैसे वन-उपवन,
फिर से फूलों-सा हो गया।
-राजेश्वरी पंत जी
 
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6 घंटे पहले

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