मछली कहती मल्लाह से,
फेंको रे जाल कोई उल्लास से,
उब चुकी हूँ इस खारे पानी से,
ले चल मुझे भी कहीं बाहर,
इस समंदर अथाह से।
कैद रहूँ समंदर में कब तक,
अब दुनिया की प्यास जगी है,
तोड़ दे आज हर बंदिश तू मेरी,
बस एक बार संभाल उल्लास से।
किनारे वाले सब कहते हैं,
मत जा कहीं बाहर, खतरा है,
थल पर हमदर्द कम, ज्यादा बगुले हैं,
अंदर से काले बाहर से उजले है
तू भी श्वेत, मैं भी श्वेत,
कह कर बगुले तुझे लुभाएँगे,
फिर पास आते ही,
झपट्टा मार तुझे खा जाएँगे।
पर मछली की मति क्षीण,
चिकनी-चुपड़ी बातों में फँस जाती है,
छोड़ संग अपनों का,
गैरों की बात में आ जाती है।
कहते हैं,
जब नाश मनुज पर छाता है,
ऐसे ही ख्यालात,
दिलों-दिमाग में,
बार-बार दोहराता है।
और अंततः,
उछल पड़ती है,
बिना जाल ही,
न समंदर मिलता
न किनारा मिलता है,
जिस थल की चाह थी,
वो भी कहाँ मिलता है,
तड़पती है रेत पर,
उसी खारे पानी की घूॅंट को
जाल तो बहाना था,
मौत ने यूँ बुलाया था,
जिसे बंधन समझा था,
वही तो सहारा था।
कहते हैं मछली को,
अब लहरें रो-रो कर,
कैद भी कभी-कभी आज़ादी है,
मीठे पानी से अच्छा खारा पानी है।
और जो अपनी सीमाओं से भागे है
सच में बहुत ही वो अभागे हैं।
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