बचपन की मां से जुड़ी भावों से भरी कहानी,
गुड्डे-गुड़ियों संग बीती भोली-भाली जिंदगानी।।
मां की मीठी लोरियों में सपनों की रवानी,
कभी कविता, कभी कथा, कभी परियों की कहानी।।
लड़खड़ाते पांवों को मां ने उंगली पकड़ानी,
बेल-सी बढ़ती उम्र को ममता से सहलानी।।
भूत, भविष्य और वर्तमान की बातें समझानी,
जीवन के हर छोटे सत्य की राह मुझे दिखलानी।।
मेरे सुख की ख़ातिर मां ने हर पीड़ा अपनानी,
धीमे-धीमे प्यार भरी लोरी रातों में सुनानी।।
नज़र लगे ना लाल को काला टीका लगवानी,
माथे पर काजल की बिंदिया प्यार से सजवानी।।
ख़ुद गीले में रात बिताकर सूखे में मुझे सुलानी,
अपनी सारी ममता मां ने लाल पर ही लुटानी।।
मां की कोख से जन्मे ज्ञानी, ऋषि, मुनि, विज्ञानी,
ममता की शीतल छांव बनी जग की अमृतवाणी।।
मां ही गीता, मां ही मंदिर, मां गंगा का पानी,
मां ही जीवन का संगीत और सांसों की रवानी।।
गर्भ में अभिमन्यु को मां ने शिक्षा दी वीरों वाली,
हर संतति को मां ने सिखलाई हिम्मत बलिदानी।।
बीत गया वो बचपन लेकिन यादें नहीं पुरानी,
मां की ममता संग महकी है मेरी हर नादानी।।
मां का ऋण चुकाने की जिसने भी बात है ठानी,
राजा, रंक, फ़कीर न कोई चुका सका क़ुर्बानी।।
मां ही सरस्वती, मां लक्ष्मी, मां दुर्गा काली भवानी,
हर प्राणी की सांसों पर है मां की ही मेहरबानी।।
संकट आए जब जीवन में मां महाकाली बन जानी,
सत्य हेतु सावित्री बन काल से भी भिड़ जानी।।
मां के रिश्ते जैसा जग में दूजा रिश्ता ना ज्ञानी,
देवों ने भी शीश झुकाई ऐसी मां ममता सयानी।।
मां ही लय है, मां ही सरगम, मां जीवन की वाणी,
मां के चरणों में अर्पित कविता कथा की ये वाणी।।
रख दे हाथ जो शीश पर मां मिट जाए मूढ़ अज्ञानी,
चरणों में शेष नवा कहे ‘अगस्त्य’ मां जग की महारानी।।
-राजेश शर्मा ‘अगस्त्य’
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