लोभ की जंजीरे एक चक्रव्यूह है,
ये एक अनन्त मायाजाल है,
ये एक अनसुलझी उलझन है,
इसमें व्यक्ति उलझता जाता है,
यह एक बहुमार्गी भूल भुलैया है,
मानव स्वयं क़ो भी भूल जाता है,
निन्यानवे की ये अदभुत लीला है,
कभी सौ का मोह नहीं छोड़ा जाता,
पहले लालच मानव का पीछा करता है,
फिर मानव ही इसके अधीन हो जाता है,
सार्वभौमिक सत्य तो केवल शून्य है,
शून्य में ही सबको विलीन होना है,
लोभ करो सदा तुम प्रभु भक्ति का,
लोभ करो परोपकार और मुक्ति का,
तभी ये मायाजाल भी टूट जायेगा,
प्रभु के दर्शन से मोक्ष मिल जायेगा |
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