बच्चे की मुस्कान
किसी सुबह की तरह होती है —
बिलकुल साफ़,
बिलकुल सच।
वो जब तोतली भाषा में
कुछ कहने की कोशिश करता है,
शब्द बिखर जाते हैं,
लेकिन भाव
सीधे दिल में उतर जाते हैं।
उसके खेलने में कोई स्वार्थ नहीं,
उसके रोने में कोई अभिनय नहीं,
वो जिस चीज़ को चाहता है,
उसे पूरी दुनिया समझता है,
और जब पा जाता है
तो उसी दुनिया में खो भी जाता है।
उसके हाथ छोटे हैं,
लेकिन सपनों को पकड़ना जानते हैं।
उसकी आँखों में
कोई साज़िश नहीं पलती,
वो जो देखता है
उसे वैसा ही मानता है।
वो नहीं जानता
झूठ क्या होता है,
या भय कैसे बोला जाता है,
उसे बस भरोसा करना आता है —
हर चेहरे पर,
हर आवाज़ पर।
कभी कभी सोचता हूँ —
काश
हम सबमें वो बच्चा
थोड़ा सा अब भी ज़िंदा होता।
–राजेश मीणा आजाद
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