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ये आंगन अब वीरान बन गया है मेरे लिए

                
                                                         
                            किसके लिए
                                                                 
                            
ज़िन्दा रहूं तो किसके लिए मरना चाहूं तो किसके लिए
था जब बचपन में तो पिता का साया छूट गया
लगा ऐसा कोई नहीं है जहां में मेरे लिए
ज़िन्दा...

सोचा मां की ममता तो जिन्दा है मेरे लिए
हुआ कुछ बङा तो मां की गोद चली गई
अपने ही दुश्मन बन गए थे मेरे लिए
जिन्दा...

रखकर पत्थर दिल पर संघर्ष किया सपनों के लिए
मिल गईं थीं नौकरी मेहनत से मेरी
लाडली भी कर पीले हाथ चली गई थी अपनी दुनिया बसाने के लिए
जिन्दा...

था एक अनुज बेफिक्री हंसी के लिए
चुन लिया था उसने भी मां बाप का साथ
छोड़ गया अकेला इस मतलबी दुनिया में तङपने के लिए
जिन्दा...

ये आंगन अब वीरान बन गया है मेरे लिए
लगा गए हैं अपने भी देखने परायेपन की नजरों से
मर रहा हूं अंदर से दुनिया के सामने मुस्कुराने के लिए
जिन्दा...।
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7 घंटे पहले

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