कितना पास था वो मेरे
कितना दूर अब हो गया
इतना दूर हो गया
कि आवाज़ भी देती हूँ
तो अनसुनी हो जाती है
जो ये हवाएं थीं मेरे साथ कभी
अब उस के साथ नज़र आती है
जो चाँद था मेरे साथ कभी
अब उस के साथ हो गया
कितना पास था वो मेरे
कितना दूर अब हो गया इतना
मोहब्बत है मुझे उससे
इत्तेफाक ये है कि उस को पता ही नहीं
मैं उस के साथ चलना चाहतीं थीं
पर उस ने कभी चाहे ही नहीं
मैं उस के लिए कुछ लिखना चाहती हूँ
पर उस ने कभी कुछ बताया नहीं
मैं उस के कंधे पर सिर रखकर रोना चाहती थी
पर उस ने कभी अपना कंधा झुकाया ही नहीं
मैं चाहती थी उस के दुखों को लेना
पर उस ने कभी मुझे समझा नहीं
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