तबाही का ये मंजर बेख़बर देखिए,
मरे बेगुनाहों की क़बर देखिए।
धुएँ और धमाकों से काँपता आसमाँ,
बरसता हुआ इंतक़ाम का कहर देखिए।
इंसाँ ही बना आज इंसाँ का दुश्मन,
हर सिम्त फैला हुआ ये ज़हर देखिए।
जो कहता था कभी—“सारा जहाँ है मेरा”,
उसी का उजड़ता हुआ ये शहर देखिए।
सारी दुनिया की नज़रें लगी हैं जंग पर,
और आप मेरी माशूक़ा की नज़र देखिए।
सियासत से, जंगों से हमें क्या, “राज”,
आप अपने ही घर का ये दफ़्तर देखिए
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